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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verses 55–57

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, verses 55–57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 55

संस्कृत श्लोक

संकल्पतः प्रम्रियते संकल्पाज्जायते पुनः । मनश्चिरन्तनाभ्यस्ताज्जीवतामेत्यनाकृति ॥ ५५ ॥ मनो मननसंमूढमूढवासनमाततम् । संकल्पाद्योनिमायाति सुखदुःखे भयाभये ॥ ५६ ॥ सुखं दुःखं च मनसि तिले तैलमिव स्थितम् । तद्देशकालवशतो घनं वा तनु वा भवेत् ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

मन चिरकाल से अभ्यस्त संकल्प से ही मरता है ओर संकल्प से ही फिर उत्पन्न होता है ओर स्वतः आकृतिरहित होने पर भी जीवाकार को प्राप्त होता है