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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verses 44–45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, verses 44–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 44,45

संस्कृत श्लोक

मनो विलुलिते स्वप्ने हृद्येवाद्रिपुरावलिम् । तनोति चलिताम्भोधिर्वीचीचयमिवात्मनि ॥ ४४ ॥ अन्तरब्धिजलाद्यद्वत्तरङ्गापीडवीचयः । देहान्तर्मनसस्तद्वत्स्वप्नाद्रिपुरराजयः ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

चंचल समुद्र जैसे अपने में लहरों की कतार को फेला देता हे वैसे ही मन स्वप्न में अपने से विक्षिप्त हृदय में ही पर्वत ओर नगरों की परम्परा का विस्तार करता हे । जैसे समुद्रान्तर्वर्ती जल तरंग, आवर्त ओर छोटी-छोटी लहरों के रूप में परिणत होता है वैसे ही देह के मध्यवर्ती मन भी स्वप्न के आवेश से पर्वत ओर नगरों की श्रेणि के रूप में परिणत होता है