Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verses 62–63
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, verses 62–63 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 62
संस्कृत श्लोक
चापले प्रसरस्तस्मादन्तर्येन नदीयते ।
मनोविलयमादत्ते तस्यालान इव द्विपः ॥ ६२ ॥
न स्पन्दते मनो यस्य शस्त्रस्तम्भ इवोत्तमः ।
सद्वस्तुतोऽसौ पुरुषः शिष्टाः कर्दमकीटकाः ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
मन के निग्रह के उपाय को, फल के साथ, दशति हैं।
इसलिए जो पुरुष विषयों के अनुसन्धान में मन को स्वतन्त्रता नहीं देता, उसका मन
गजबन्धनस्तम्भ में वधे हुए हाथी के समान विलय को प्राप्त हो जाता है