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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verses 26–28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, verses 26–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 26-28

संस्कृत श्लोक

सर्वत्र स्थितया स्वच्छरूपया निर्विकारया । समया सूक्ष्मया नित्यं चिच्छक्त्या साक्षिभूतया ॥ २६ ॥ सर्वभावानुगतया न चेत्यार्थविभिन्नया । रामात्मसत्तया मूकमपि देहसमं जडम् ॥ २७ ॥ मनोऽन्तश्चलति व्यर्थं मननैषणमुह्यया । बहिर्गिरिसरिद्व्योमसमुद्रपुरलीलया ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, मन की इससे बढ़कर पदार्थो की विपरीत कल्पना की सामर्थ्य ओर क्या कही जाय ? देखिये न, मन सब जगह स्थित, समत्व, स्वच्छत्व, निर्विकारत्व, सूक्ष्मत्व आदि स्वभाववाली, साक्षिस्वरूप, सब पदार्थो में अनुगत, चेत्य पदार्थो से अभिन्न, चिन्मात्ररूप, आत्मसत्तामात्र से स्थित, वाग्‌ आदि सब क्रियाओं से रहित भी ब्रह्म को देहतादात्म्य की कल्पना से देह के तुल्य ओर जड बनाकर अन्तःकरण में काम, संकल्परूप भ्रान्ति से ओर बाहर पर्वत, नदी, समुद्र, आकाश, नगर आदि की लीला से कल्पना कर व्यर्थ ही घूमता है