Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
मनस्युल्लसिते स्वप्ने हृद्येव पुरपर्वताः ।
आकाश इव विस्तीर्णे दृश्यन्ते निर्मिताः क्षमाः ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न में मनके उल्लास को प्राप्त होने पर
हृदय में ही निर्मित नगर, पर्वत आदि विस्तीर्ण आकाश में निर्मित नगर, पर्वत आदि के सदुश
अपने-अपने कार्य को करने में समर्थ दिखाई देते हैं