Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
सदेव हि महादुःखमसत्तां नयति क्षणात् ।
निष्कलङ्का मनोवृत्तिरन्धकारमिवार्करुक् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सकलंक असत् मनोवृत्ति चेतन के दुःख की वृद्धि करती है वैसे ही
वासनाओं का क्षय हो जाने पर वासनारूपी कलंक से निर्मुक्त स्वाभाविक सद्रूप मनोवृत्ति ही
इस तरह महादुःख को शून्य करती है जिस तरह सूर्य की प्रभा अन्धकार को दूर कर देती हे
यानी बोध से महादु-ख का बाध कर देती है