Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verse 40

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 40

संस्कृत श्लोक

सुखीकर्तुं सुदुःखानि दुःखीकर्तुं सुखानि च । सुखेनैवाशु युज्यन्ते मनसोऽतिशया मुनेः ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

अतएव उनमें काम आदिका विकार नहीं देखा जाता है, ऐसा कहते हैं। जिसका बालों का जूड़ा सुगन्धित फूलोंसे सुशोभित है और जिसने हाव-भाव से कटाक्ष मारे हैं ऐसी नायिका मनरहित पुरूष के शरीर से चिपट भी जाय, तो उसकी दृष्टि में काठ और भीत के तुल्य है यानी तनिक भी विकार पैदा करने में सक्षम नहीं है ॥३ ८॥ इसी प्रकार दुःख-निमित्तों से दुःखरूप विकार भी उनको नहीं होता है ऐसा कहते हैं। वीतराग नाम के मुनि ने मन के अन्यत्र संलग्न होनेके कारण वन में मांसाहारियों द्वारा चबाये गये हाथ को नहीं देखा, जो कि ध्यान के समय गोद में पसारा था ॥ ३ ९॥ मुनि के मन की भावनाएँ, जो अभ्यास की अधिकता से उत्पन्न की जाती हैं, बड़े-से-बड़े दुःखों को सुख बनाने के लिए तथा सुखों को दुःखरूप में परिणत करने लिए अनायास ही समर्थ होती हैं