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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verses 14–16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, verses 14–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 14-16

संस्कृत श्लोक

यत्कृतं मनसा तात तत्कृतं विद्धि राघव । यत्त्यक्तं मनसा तावत्तत्त्यक्तं विद्धि चानघ ॥ १४ ॥ मनोमात्रं जगत्कृत्स्नं मनः पर्यन्तमण्डलम् । मनो व्योम मनो भूमिर्मनो वायुर्मनो महान् ॥ १५ ॥ मनो यदि पदार्थे तु तद्भावेन न योजयेत् । ततः सूर्योदयेऽप्येते न प्रकाशाः कदाचन ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे रघुवर, जो मन ने किया, उसी को आप किया हुआ समझिये। हे पुण्यमय जिसका मन ने त्याग किया उसीको त्याग किया हुआ जानिये । एकमात्र मन ही यह सारा जगत्‌ है और मन ही भूमि का प्रान्त हे । मन ही आकाश है, मन ही भूमि है, मन ही वायु है, मन ही महत्तत्त्व है । मन यदि सूर्य आदि पदार्थो में प्रकाशादिरूप से युक्त न हो, तो सूर्योदय होने पर भी ये प्रकाश आदि कदापि न हों