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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verses 31–33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, verses 31–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 31-33

संस्कृत श्लोक

स्पन्देषु वायुतामेति प्रकाशेषु प्रकाशताम् । द्रवेषु द्रवतामेति चिच्छक्तिस्फुरितं मनः ॥ ३१ ॥ पृथ्व्यां कठिनतामेति शून्यतां शून्यदृष्टिषु । सर्वत्रेच्छास्थितिं याति चिच्छक्तिस्फुरितं मनः ॥ ३२ ॥ शुक्लं कृष्णीकरोत्येव कृष्णं नयति शुक्लताम् । विनैव देशकालाभ्यां शक्तिं पश्यास्य चेतसः ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्‌- शक्ति से प्रस्फुरित मन स्पन्दों में वायुता को प्राप्त होता है, प्रकाशो मेँ प्रकाशता को प्राप्त होता है, द्रवों में द्रवता को प्राप्त होता हे, पृथिवी मेँ कठिनता को तथा "नहीं है" इस प्रकार जिनका ग्रहण होता है, उन शून्य वस्तुओं में शून्यता को प्राप्त होता है यों चित्‌ शक्ति से स्फुरित हुआ मन सर्वत्र अप्रतिहर स्वच्छन्दता को प्राप्त होता है। देश और काल के बिना ही मन सफेद को काला कर देता है और काले को सफेद कर डालता है । इस चित्तकी इस प्रकारकी अद्भुत शक्ति देखिये