Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
परमात्कारणादादौ चिच्चेत्यपदपातिनी ।
कलनापदमासाद्य कला कलिलतां गता ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
मन वासनामय है, अतएव वासनाओं का आत्यन्तिक उच्छेद ही मन के शमन का उपाय
है । वासना के आत्यन्तिक उच्छेद का उपाय शास्त्राभ्यास, आचार्योपिदेश ओर अपने अनुभव
से सकल दृश्य और अपने अनुभव से सकल दश्यपदार्थ एकमात्र मन की भ्रान्ति रूप हैं, यह
निश्चयपूर्वक सप्तम भूमिकारोहपर्यन्त ज्ञान को परिपक्व करनेवाला मनोनिरोध ही है, यह
कहने के लिए जड से मन के स्वरूप का शोधन करते हुए श्री वसिष्ठजी कहते है ।
वत्स, परम कारण यानी चैतन्यसंवलित अज्ञान से ही सर्वप्रथम शुद्ध चेतन चेत्यपदवी को
प्राप्त हुआ, वस्तुतः वह चेत्य पदवी को प्राप्त नहीं है, क्योंकि वह निर्विकार है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ नौवाँ सर्ग समाप्त एक सौ दसवाँ सर्ग॑ मन के वैभव के वर्णन द्वारा मन के शमन के उपाय का वर्णन |