Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verses 37–39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, verses 37–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
अत्यन्तभिन्नयोरैक्यं येषां चित्तशरीरयोः ।
ज्ञातज्ञेया महात्मानो मनस्यास्ते सुपण्डिताः ॥ ३७ ॥
कुसुमोल्लासिधम्मिल्ला हेलाचलितलोचना ।
काष्ठकुड्योपमाङ्गेषु लग्नाप्यमनसोऽङ्गना ॥ ३८ ॥
मनस्यन्यत्र संसक्ते वीतरागेण कानने ।
क्रव्यादचर्वितोऽङ्कस्थः स्वकरोऽपि न लक्षितः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि इन्द्रियों द्वारा आलोचित आकार को धारण करने से
मन इन्द्रियों के कारण साकार है और इन्द्रियाँ मनके अधीन पदार्थ की आलोचक होने से मन
से साकार हैं, इस प्रकार दोनों में समता है तथापि मन उत्कृष्ट है, क्योंकि मन से इन्द्रियाँ
उत्पन्न हुई हैं, इन्द्रियों से मन उत्पन्न नहीं हुआ है ॥३ ६॥
उस मन की मूढ आत्मकोटि में गणना कर “अहम् यों उसका आत्मरूप से ग्रहण करते हैं,
किन्तु तत्त्वज्ञानी देहकोटि में उसकी गणना कर जड़ देहरूप से उसका ग्रहण करते हैं अतएव
निर्विकार आत्मा के ज्ञाता वे महात्मा वन्दनीय हैं, ऐसा कहते हैं।
मूढ़ो की दृष्टि से चित्त और शरीर का अन्धकार और प्रकाश के समान अत्यन्त भेद है।
जिन महात्माओं की दृष्टि से मूढ़दृष्टि से अत्यन्त भिन्न चित्त और शरीर का एेक्य है, उन
महापण्डितों को ज्ञातव्य तत्त्व का ज्ञान हो गया हे, अतएव वे सबके वन्दनीय है