Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verses 65–66
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, verses 65–66 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
संयमान्मनसः शान्तिमेति संसारविभ्रमः ।
मन्दरेऽस्पन्दतां याते यथा क्षीरमहार्णवः ॥ ६५ ॥
मानस्यो वृत्तयो या या भोगसंकल्पविभ्रभैः ।
संसारविषवृक्षस्य ता एवाङ्कुरयोनयः ॥ ६६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे मन्दराचल
के निश्चल होने पर क्षीरसागर शान्त हो जाता है वैसे ही मन के संयम से संसारभ्रान्ति शान्त
हो जाती है