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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verse 29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

जाग्रच्चाभिमतं वस्तु नयत्यमृतमृष्टताम् । अनीहितं च विषतां नयत्यमृतमप्यलम् ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि किसी को यह शंका हो कि मूढ मन भले ही अन्यथा कल्पना करे परन्तु विचार से जागरूक हुआ मन अन्यथा कल्पना नहीं करेगा, ऐसी परिस्थितिमे विचार जागरुक मनके विनाश की चिन्ता से क्या प्रयोजन है, इस पर कहते है । विवेक से जागरूक हुआ मन भी यद्यपि रत्री-अधर आदि वस्तु अस्वादु ओर उच्छिष्ट है तथापि उसे राग आदि से अभीष्ट अमृत के तुल्य स्वादु बना डालता हे । यदि अभिलाषा न हो तो अमृत को भी विष के तुल्य हेय बना डालता है क्योकि विरक्त पुरुषों की अमृत में भी हेयताबुद्धि देखी ही जाती है