Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verses 47–49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, verses 47–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 47-49
संस्कृत श्लोक
व्यतिरिक्ता यथा हेम्नो न हेमवनिता तथा ।
जाग्रत्स्वप्नक्रियालक्ष्मीर्व्यतिरिक्ता न चेतसः ॥ ४७ ॥
धाराकणोर्मिफेनश्रीर्यथा संलक्ष्यतेऽम्भसः ।
तथा विचित्रविभवा नानातेयं हि चेतसः ॥ ४८ ॥
स्वचित्तवृत्तिरेवेह जाग्रत्स्वप्नदृशोदितम् ।
रसावेशादुपादत्ते शैलूष इव भूमिकाम् ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सुवर्ण की प्रतिमा सुवर्णं से भिन्न
नहीं हे वैसे ही क्या जागत् और क्या स्वप्न की विविध क्रियाएँ चित्त से पृथक् नहीं हैं ? जैसे
जलकी धारा, सीकर, तरंग, बुदूबुद् आदि शोभा दिखाई देती हे यानी एक ही जल, धारा आदि
अनेक रूपों में प्रतीत होता हे वैसे ही मनकी यह विचित्र विभववाली नाना विचित्रता है, इसमें
कुछ भी सन्देह नहीं हे । जैसे श्रृंगार आदि के आवेश से नट विलक्षण-विलक्षण वेषों के आविर्भाव
को स्वीकार करता हे वैसे ही यहाँ पर अपनी चित्तवृत्ति ही राग के आवेश से जाग्रत ओर स्वप्न
दृष्टि से आविर्भाव को प्राप्त होती हे