Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verses 35–36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, verses 35–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
यच्चित्तदृष्टं तद्दृष्टं न दृष्टं तदलोकितम् ।
अन्धकारे यथा रूपमिन्द्रियं निर्मितं तथा ॥ ३५ ॥
इन्द्रियेण मनो देहि मनसेन्द्रियमुन्मनः ।
इन्द्रियाणि प्रसूतानि मनसो नेन्द्रियान्मनः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
जो वस्तु चित्त द्वारा देखी गई वही दृष्ट है। यदि चित्त ने नहीं देखी, तो सामने स्थित होने
पर भी वस्तु दृष्ट नहीं होती ।
चक्षु आदि इन्द्रियो की मन ने ही अपने में कल्पना कर रक्खी है, ऐसा कहते हैं।
जैसे अँधेरे में छायावैचित्र्यरूप नीलता की कल्पना होती है वैसे ही उसने अपने में इन्द्रियों
का निर्माण कर रक्खा है