Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verses 41–42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, verses 41–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 41,42
संस्कृत श्लोक
मनस्यन्यत्र संसक्ते कथ्यमानापि यत्नतः ।
लता परशुकृत्तेव कथा विच्छिद्यते बत ॥ ४१ ॥
मनस्यद्रितटारूढे गृहस्थेनापि जन्तुना ।
शुभ्राभ्रकन्दरभ्रान्तिदुःखं समनुभूयते ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
मन कहीं और जगह में उलझा हो, तो बड़े जतन से कही जा रही कथा भी ऐसे छिन्न-भिन्न हो
जाती है जैसे कि कुल्हाड़ी से काटी गई लता छिन्न-भिन्न हो जाती है। यदि मन पर्वतके
शिखर पर आरूढ हो, तो घर में बैठा हुआ जीव भी स्वप्न में सफेद मेघों से युक्त कन्दराओं की
भ्रान्ति के दुःख का अनुभव करता हे