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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 91

नब्बेवाँ सर्ग समाप्त डक्यानबेवाँ सर्ग तेज की धारणा से तेजरूप बनकर श्रीवसिष्ठजी ने जो सूर्य, चन्द्र, अग्नि एवं रत्न आदि के चमत्कार देखे, उनका वर्णन।

63 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, उसके बाद-जल धारणा से विचित्र कौतुक देखने के बाद-प्…
  2. Verse 2हुए पदार्थों को छोडकर भाग रहे चोरों पर राजा प्रतापी होता है
  3. Verse 3जैसे श्रेष्ठ राजा तरह-तरह की वेशभूषा से परिभ्रमण करनेवाले स्नेहयुक्त गुप्तचरों द्वारा सबक…
  4. Verse 4मैंने तेजरूप बनकर केवल दूसरों के प्रकाश के प्रकाशन में ही तत्पर रहनेवाले, अतएव जनों एवं भ…
  5. Verse 5तेज अन्धकार को क्यो दूर फेंक देता है 2 इस पर कहते हैं / भद्र, यह विद्यमान सम्पूर्णं जगत्‌…
  6. Verse 6श्रीरामचन्द्र, मैं जिस तेज के रूप में परिवर्तित हुआ, वह तेज तमोरूप तमाल वृक्ष के लिए तो फ…
  7. Verse 7संसार में जितने भी रूप हैं, वे सब प्रकाश के (तेज के) ही अंश हैं, अतः सदा आलोक की (तेज की)…
  8. Verse 8रामजी, यह तेज पृथ्वी के साथ अत्यन्त घनी प्रीति रखता है, इसीलिए तेज अग्नि द्वारा पृथ्वी को…
  9. Verse 9तमोभाय, रजोभाग एवं सत्वभाग की बहुलता से युक्त पाताल आदि लोको में तेज के प्रकाश का तारतम्य…
  10. Verse 10सत्त्वगुणमय यानी सत्त्वगुण की प्रचुरता से युक्त देवलोकों में यह निरन्तर महान्‌ प्रकाश करत…
  11. Verse 11दिशारूपी वधुओं के लिए तो यह तेज निर्मल दर्पण है यानी उनको अलग अलग करके दर्शाता है, निशारू…
  12. Verse 12दिवसरूपी धानो के लिए वह क्यारी है, तमसे (अन्धकार से) आक्रान्त रूपादिके लिए तो वह साक्षात्…
  13. Verse 13तेज पदार्थों मेँ सत्ता का प्रदान करनेवाला तथा उनको प्रकाशित भी करनेवाला है, इसलिए चिन्मात…
  14. Verse 14तेज क्रियारूप कमलिनी के लिये सूर्य है ओर भूतल के हृदय का जीवन है । चाक्ुषवृत्ति ओर मानस व…
  15. Verses 15–16यह तेज विशाल ब्रह्मांड के खन्दक में रहनेवाला बड़ा समुद्र ही हैं, यों उत्प्रेक्षा करने के…
  16. Verse 17भद्र, मैं तेज बनकर सुवर्णादि में सुन्दर वर्ण (रंग) बन गया, मनुष्यादि में पराक्रम बन गया,…
  17. Verse 18राघव, मुख के सदुश चन्द्रबिम्बं मे ज्योत्सना बन गया, बरौनीवाले नेत्ररूपी चिह्न से (अंकसे)…
  18. Verse 19कामिनीजनों में मेँ कपोल, बाहु, नेत्र, भौंह, हाथ, केश आदि को अति सुन्दरता से प्रकाशित करने…
  19. Verse 20श्रीरामजी, तेज की धारणा से तेज होकर में वृत्र आदि असुरो के, जो त्रिभुवनको तृण के समान समझ…
  20. Verse 21वीर पुरुषों में रणांगणों में निर्भय विचरण करने का कारण जो उद्भूत पराक्रम प्रसिद्ध है, वह…
  21. Verse 22देवो में दानवो का शत्रु, दानवाँ में देवताओं का शत्रु, सब भूतों में उत्तम बल तथा वृक्ष आदि…
  22. Verse 23हे कमलदललोचन, तदनन्तर अपनी धारणा से कल्पित उन जगदाकाश के कोशों में मै सूर्य होकर नीचे कही…
  23. Verse 24उसीको कहते हैं । भद्र, मैंने अपने सूर्य के स्वरूपका अनुभव किया, उस रूपसे मैंने दसों दिशाओ…
  24. Verse 25मेरा सूर्यस्वरूप चन्द्र की कामना करनेवाले कुमुदों के लिए कोशबन्धन का हेतु चक्र बना, अन्धक…
  25. Verse 26इसी तरह मैं चन्द्ररूप भी बन गया। मेरा चन्द्र का जो स्वरूप हुआ, उसका आकार अमृत से लबालब भर…
  26. Verse 27वह मेरा चन्द्र का रूप समस्त जगत्‌ की सुन्दरतारूपी लक्षिमयों के उपमान तथा रात्रि, रोहिणीरू…
  27. Verse 28अधिक क्या कहें, जितने संसार में प्राणी हैं, उन सबके नेत्र और मुखका आह्लाद और विकास का हेत…
  28. Verse 29भद्र, मैं रतन बन गया । कुछ समय मेरा यह स्वरूप बाजारों में जौहरियों के हाथों से तुलापर तोल…
  29. Verse 30श्रीराघव, समुद्र का जल पी जानेवाला बडवानल भी मैं बन गया । मैंने अपने बडवानल रूप से समुद्र…
  30. Verse 31मैंने अग्नि बनकर इस प्रकार दीप्तिपूर्वक जलना आरम्भ किया कि उसमें लकड़ियों का विदारण तत्का…
  31. Verse 32जब मैं अग्नि बना तब सुवर्ण, माणिक्य, मोती, मणि आदि जो चमकीली ज्योतियाँ थी, उनका कोशागार क…
  32. Verse 33मोती बनकर जो कुछ अनुभव किया, उसे भी प्रसगवश कहते हैं । भद्र, तदनन्तर मैं मोती बन गया । और…
  33. Verse 34खद्योत बनकर जो अनुभव किया, उसे कहते हैं । खद्योत बनकर मैंने मार्ग मे गमन कर रहे मनुष्यों…
  34. Verse 35जल के आवर्तों से शब्दायमान आकाशस्थ मेघों में विद्युत का रूप लेकर मैंने समुद्र में मछली के…
  35. Verse 36मैंने कहीं दीपक रूप भी ले लिया । दीपक के रूप में जब मेरी अन्तःपुर में स्थापना हुई, तब रमण…
  36. Verses 37–38बत्ती के आगे के हिस्से में कभी- कभी काजल का एक जाल-सा बन जाता है । यह दीपज्वालारूप सोने क…
  37. Verse 39राघव, कभी कल्पान्त का अग्नि बनकर मैंने कल्पान्त में समस्त जगत्‌ में खूब परिभ्रमण किया । भ…
  38. Verses 40–41मैंने जब अग्नि की देह धारण की थी, तब जलती लकड़ियाँ ही मेरे उल्मुक दाँत बन गए, ज्वालाएँ हा…
  39. Verse 42लोहार आदि कारीगरों की प्रयोगशालाओं में लोहपिण्डों में रहकर मैने मुद्गर तथा पत्थरों से ताड…
  40. Verse 43भद्र, कहीं पर मैंने बड़ी बड़ी चट्टानों के अन्दर पाषाणमणिका (हीरा, पन्ना आदि का) रूप लेकर…
  41. Verse 44श्रीरामभद्र ने कहा : हे मानद, हे मुनिवर, उस पाषाण आदि अवस्था में क्या आपने सुख का अनुभव क…
  42. Verse 45विदानन्दैकरसस्वरूप ब्रह्मक्रत मैने केवल कोंठुकवश जयद्वपता का आरोप देखा था, इसलिए उक्त पाष…
  43. Verse 46जब ब्रह्म अपने को पृथ्वी आदि के रूप के सदृश समझने लगता है, तब सुषुप्त के सदृश जड़-सा बनकर…
  44. Verse 47क्यों ब्रह्म का अन्यथाभाव नहीं होता 2 इस आशंका पर कहते हैं / ब्रह्म में जो आकाश, पृथ्वी आ…
  45. Verse 48अन्नान होने पर ही दुःख आता हैं, किन्तु वह नहीं हैं, यह कहते हैं / भद्र, जिस पुरुष को यह स…
  46. Verse 49भद्र, उन धारणाओं में मैंने जो कुछ उस प्रकार का जगन्निर्माण किया, वह सब विशुद्ध ब्रह्मरूप…
  47. Verse 50जब परमार्थ-दशा में यह सब कुछ दृश्य निर्विकार ब्रह्मरूप ही सिद्ध हुआ तब ब्रह्मपद में ही रह…
  48. Verse 51यदि पाषाण मणि आदि का रुप होने पर मुझमें चैतन्य न रहता, तो उनका अनुभव और स्मरण आज मुझको हो…
  49. Verse 52तब चुष्ञप्ति अवस्था में मैंने कुछ नहीं जाना यह ज्ञान के अभाव का अनुभव केसे होता है ? इस प…
  50. Verse 53तत्वज्ञान की प्राप्ति से स्थूल व्यष्टि- समष्टि देह की आधिभोतिक भावना नष्ट हो जाती हैं, इस…
  51. Verse 54बोधरूपी उक्त आतिवाहिक देह छोटी हो चाहे बड़ी हो, उससे अपनी इच्छानुसार पुरुष निर्वाणरूप (सम…
  52. Verse 55बोधरूप देह के प्रभाव से अभेद्य पाषाण शिलाओं के भी भीतर प्रवेश करके पुरुष अनायास बाहर निकल…
  53. Verse 56इस्रलिए मुझे दुःख की प्राप्ति नहीं हुई. यह कहते हुए उपसंह्ार करते हैं । हे श्रीरामभद्र, इ…
  54. Verse 57भद्र, वज, पत्थर, पाताल, आकाश एवं स्वर्ग आदि में यातायात कर रहे उसी तरह के विशुद्ध आत्मा क…
  55. Verse 58बोधमात्र शरीर से यह आत्मा जड़ पदार्थों में जब तक रहता है तब तक उसी रूप से (बोधमात्र शरीर…
  56. Verse 59यह सक कोंदुक अपनी इच्छा से ही किये यये थे, इसलिए भी दुःख की प्राप्ति नहीं हुई. इस आशय से…
  57. Verse 60आप भी तत्त्वज्ञानी हैं; इसलिए आतिवाहिक देहभाव और धारणाओं के अनुसार जयद्भावरुपी कोंदुकों क…
  58. Verse 61इच्छा से ही तत्वज्ञ पुरुष सूयि समस्त जगत्‌ को विलीन करके आत्ममात्रस्वरूप से स्थापित कर सक…
  59. Verse 62हम लोगो की दृष्टि में जयत्‌ तो सत्य हैं. फिर वह सत्‌-स्रा बनकर स्थित ह यह केसे कहते हैं 2…
  60. Verse 63भद्र, जैसे कोई कौतुकी पुरुष मनोराज्य से कल्पित अंगारों की नदी के तरगों का अंग से स्पर्श ह…
  61. Verse 64यो श्रीरामभद्र के प्रश्न का उत्तर देकर अब प्रस्तुत विषयपर आकर श्रीवकिष्टकी कहते है / भद्र…
  62. Verse 65हे प्रिय, दुष्ट पुरुष की लक्ष्मी के सदृश बढ़ी हुई तथा घटाटोपपूर्ण चंचल ऊँची ऊँची ज्वालामा…
  63. Verse 66हे रामजी, तेजःस्वरूप बनकर मेने परमाणु कणों के भीतर इसी तरह की जिस प्रत्येक जगत्‌-शोभा का…