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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 39

संस्कृत श्लोक

क्वचिदाकल्पमापीय वाडवाग्नितया जलम् । जगत्सु गगनेष्वन्ते ननृते जलराशिषु ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

राघव, कभी कल्पान्त का अग्नि बनकर मैंने कल्पान्त में समस्त जगत्‌ में खूब परिभ्रमण किया । भ्रमण करने के कारण उस समय मुझे जो बड़ा परिश्रम हुआ, उससे कज्जल श्याम आकाश में कहीं ऐसे विलीन हो जाता था, जैसे इन्द्र के वाहन काले मेघों में विद्युत विलीन हो जाती है ॥३ ८॥ कहीं वडवाग्नि के रूप से मने कल्पपर्यत खूब जलपान किया, तदनन्तर सब जगत्‌ और सब जल जब आकाश पानी शून्यरूप हो गये, तब आकाश में नृत्य किया