Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
अन्धकारस्य दैन्यस्य समस्तगुणनाशिनः ।
दृश्यं सदृश्यमनिशं सर्वस्य गुणशालिनः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
तेज अन्धकार को क्यो दूर फेंक देता है 2 इस पर कहते हैं /
भद्र, यह विद्यमान सम्पूर्णं जगत् समस्त गुणों को छिपा देनेवाले अन्धकाररूपी दीनता का
विषय है यानी अन्धकाररूपी दीनता जगत् में जो रूप आदि गुण हैं , उनको दिखने नहीं देती ओर
दूसरे की दीनता को दूर करने में समर्थ सभी गुणशाली पुरुष उत्तम-दीनतारहित-जगत् को देखना
चाहते है, अतः तेज के द्वारा अन्धकार को समस्त जगत से हटा देना युक्त ही है