Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
घनस्नेहरसं पृथ्व्या रक्षितानलवेधनम् ।
गृहं प्रति घनानन्दैर्वृतदीपकपुत्रकम् ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
रामजी, यह तेज पृथ्वी के साथ अत्यन्त घनी प्रीति रखता है, इसीलिए तेज अग्नि द्वारा
पृथ्वी को (मिट्टी को) नहीं जलाता । पृथ्वी भी अपना स्नेह व्यक्त करने लिए हर एक घर में बड़े
प्रेम से भीत, प्रासाद (महल) आदि का रूप लेकर तेज के पुत्र दीपकं की-वायु आदि के झकोरों
से-रक्षा करती है