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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verses 40–41

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, verses 40–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 40,41

संस्कृत श्लोक

क्वचिदुल्मुकदन्तेन मया ज्वालाभुजात्मना । विलोलधूमावर्तोग्रकुन्तलेनाकुलौजसा ॥ ४० ॥ पुरपल्वलदाहेषु कवलीकृतजन्तुना । कृताः कृताष्ट काष्ठादिपदार्थाः खादनोचिताः ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

मैंने जब अग्नि की देह धारण की थी, तब जलती लकड़ियाँ ही मेरे उल्मुक दाँत बन गए, ज्वालाएँ हाथ बन गई और चंचल धूम्र के आवर्तं केश हो गये । इस रूपसे जब नगर ओर प्ररूढ लतापल्लवों का दाह करना आरम्भ किया तब हे कृताष्ट (दयादि आठ गुणों को स्थिर बनानेवाले हे श्रीरामजी), जन्तुओं को ग्रास कर जानेवाले मैंने काष्ठ आदि पदार्थों को अपना खाद्य बना दिया