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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 62

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, verse 62 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 62

संस्कृत श्लोक

स्थितं स्वप्नादिजगति तमसेवासतेव च । आवृतेनेव वान्यासामलभ्येन सता दृशम् ॥ ६२ ॥

हिन्दी अर्थ

हम लोगो की दृष्टि में जयत्‌ तो सत्य हैं. फिर वह सत्‌-स्रा बनकर स्थित ह यह केसे कहते हैं 2 इ शका पर स्वप्न आदि जयत्‌ के विद्यमान रहते जाग्रत जयत्‌ जैसे अस्त्‌-सा रहता है, यह कहते हैं / जैसे जाग्रत-पुरुष की दृष्टि में विद्यमान ही जगत्‌ सुप्त पुरुष में प्रसिद्ध स्वप्नादि जगत्‌ में अज्ञानता के कारण असत्‌-सा, शून्यभाव के कारण आवृत-सा या स्वप्नद्रष्टापुरुषों के द्वारा अलभ्य-सा बनकर स्थित है, वैसे ही प्रकृत में समझना चाहिए