Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
कचत्काञ्चनमाणिक्यमुक्तामणिमयं महः ।
तपस्तां नीतमाक्षिप्य पाण्डित्यमिव पामरैः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
जब मैं अग्नि बना तब सुवर्ण, माणिक्य, मोती, मणि आदि जो चमकीली
ज्योतियाँ थी, उनका कोशागार के दाह द्वारा पराभव कर उनके स्वामियों को ऐसा सन्ताप पहुँचाया,
जैसे अनेक मूर्ख बलवानों के द्वारा वितण्डा से एक पण्डितको सन्ताप पहुँचाया जाता है।
(इक्र विषय की कहावत है कि एक पलाश के पेड़ को देखकर पंडित ने कहा - यह पलाश वृक्ष
है / इस पर वहाँ विद्यमान अनेक मूर्खो ने मिल कर का : नहीं यह पाढ़र का पेड़ ह / झयड़ा बढ़ा
ओर यूर्खो ने पण्डित की मुक््कों से पूजा आरम्भ की, पण्डित भी दुःखी होकर कहने लगा : हाँ. यह
पाढ़र का पेड़ है)