Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
आत्मानं चेतति ब्रह्म पृथ्व्यादीव यदा तदा ।
सुप्तं जडमिवास्तेऽन्तः स्यादस्य न तदन्यथा ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
जब ब्रह्म अपने को पृथ्वी आदि के रूप के सदृश समझने लगता है, तब सुषुप्त के सदृश
जड़-सा बनकर स्थित रहता है, वास्तव में इसका जो भीतरी सच्चिदानन्दात्मक स्वभाव है,
उसका अन्यथाभाव कभी नहीं होता, इसलिए दुःख की प्राप्ति नहीं हो सकती