Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
विभ्रान्तं स्तनशृङ्गेषु मुक्ताहारतया तया ।
असुरोरगगन्धर्वनरनायकयोषिताम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
मोती बनकर जो कुछ अनुभव किया, उसे भी प्रसगवश कहते हैं ।
भद्र, तदनन्तर मैं मोती बन गया । और मोतियों के हार रूपसे असुर, नाग, गन्धर्व और
नरनायकों की रमणियों के स्तनों पर मैंने दीर्घकाल तक विश्राम किया