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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 53

संस्कृत श्लोक

यस्तु ज्ञानप्रबुद्धात्मा देहस्तस्याधिभौतिकः । शाम्यत्युदेति विमलो बोधात्मैवातिवाहिकः ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्वज्ञान की प्राप्ति से स्थूल व्यष्टि- समष्टि देह की आधिभोतिक भावना नष्ट हो जाती हैं, इसलिए भी जड़ दुःख की ग्राप्ति नहीं हो सकती, इस आशय से कहते हैं। जिस पुरुष की आत्मा सत्यज्ञान से जग गई है, उसकी आधिभौतिक देह तत्काल विलीन हो जाती है यानी देह में आधिभौतिकता की प्राप्ति ही नहीं रहती और निर्मल बोधरूप आतिवाहिक देह की उत्पत्ति हो जाती है