Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 63
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, verse 63 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 63
संस्कृत श्लोक
तरङ्गलेखयाङ्गारसरितः स्वाङ्गलग्नया ।
मनोराज्यश्रियेवाशुक् प्रोत्पन्नस्तद्वदेहया ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, जैसे कोई कौतुकी
पुरुष मनोराज्य से कल्पित अंगारों की नदी के तरगों का अंग से स्पर्श हो जाने पर भी दुःखी
नहीं होता, वैसे ही मैं अपनी थोड़ी इच्छा के कारण पाषाण, मणि आदि रूप हो जाने पर भी
दुःखग्रस्त नहीं हुआ