Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
सत्त्वात्मसु महासत्त्वं नित्यत्वं देवसद्मसु ।
जगज्जीर्णकुटीदीपः कूपोम्भस्तमसोर्महान् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
सत्त्वगुणमय यानी सत्त्वगुण की प्रचुरता से युक्त देवलोकों में यह निरन्तर महान्
प्रकाश करता है । भद्र, यह तेज जगद्रूपी जीर्ण-शीर्ण कुटिया का दीपक है और अन्धकार के लिए
महा अगाध कूप है यानी जैसे अगाध कूप जल को अपने उदर में निगल जाता है वैसे ही यह
अन्धकार को अपने अन्दर निगल जानेवाला है