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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 59

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, verse 59 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 59

संस्कृत श्लोक

स्वेच्छयैव चलित्वाथ ततोऽन्यत्र प्रयाति चेत् । तच्चैव स्थितिं याति तत्तथैवागतिर्यथा ॥ ५९ ॥

हिन्दी अर्थ

यह सक कोंदुक अपनी इच्छा से ही किये यये थे, इसलिए भी दुःख की प्राप्ति नहीं हुई. इस आशय से कहते हैं । अपनी ही इच्छा से यदि कोई चलकर फिर अन्यत्र जाता है, या वहाँ स्थिति करता है, या वहाँ से वापस चला आता है, तो दुःख नहीं होता, ठीक इसी प्रकार की यहाँ भी स्थिति है यानी अपनी इच्छा से किये गये कौतुकों में मुझे किसी प्रकार का कष्ट नहीं हुआ, क्योकि वैसा करना इष्ट ही था, अनिष्ट नहीं