Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
नेत्रवृन्दस्य वक्त्रस्य द्युलतापुष्पजालकम् ।
स्वर्गौघमशकव्यूहं तारकापटलं मृदु ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
अधिक क्या
कहें, जितने संसार में प्राणी हैं, उन सबके नेत्र और मुखका आह्लाद और विकास का हेतु होने के
कारण वह अत्यन्त ही प्रिय लगता था । श्रीरामजी, तदनन्तर मैं मृदु तारासमूह बन गया यानी
अपने में समस्त तारों के स्वरूप का अनुभव करने लगा । यह मेरी तारात्मता आकाशरूपी लता की
मानों पुष्प राशि थी, और स्वर्गसुखरूपी मकरन्द के प्रवाह मेँ आसक्त मानों मच्छरों की कतार
थी