Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
दारुदारणदुर्वारदीप्तं ज्वलनमाततम् ।
यज्ञाग्निदाहकल्याणं विस्फोटकठिनारवम् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
मैंने अग्नि बनकर इस प्रकार दीप्तिपूर्वक
जलना आरम्भ किया कि उसमें लकड़ियों का विदारण तत्काल हो जाता था, इसीसे लकड़ियों के
विस्फोटों से चारों ओर दुर्वार कठिन शब्द उत्पन्न होते थे तथा यज्ञाग्नि होकर मैंने हविष् दाह का
भी आनन्द लूटा