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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, Verses 37–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 91, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

क्वचित्कज्जलजालस्य ज्वालाकनकदाकृते । खेदिना घनकूर्माभं सङ्गेनैव स्वकोटरे ॥ ३७ ॥ कल्पान्तेषु क्वचित्सर्वजगद्भ्रमघनश्रमात् । खे कज्जलासिते लीनं रुद्रेभ इव विद्युता ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

बत्ती के आगे के हिस्से में कभी- कभी काजल का एक जाल-सा बन जाता है । यह दीपज्वालारूप सोने के टुकड़े को तोड़-फोड़ देता है, यही इसका स्वरूप है, भद्र, इस कज्जलजाल के ही समागम से कभी मन्दप्रभ बनकर ज्वालादि अंगों को समेट लेने के कारण दीपक रूप में मैं घन कूर्म का रूप भी बना लेता था