Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 80
उननासीवाँ सर्ग समाप्त अस्सीवाँ सर्ग अज्ञ राजा द्वारा चूडाला के वचन में असम्बद्धत्व और खेचरत्व आदि सिद्धियों के बीज का वर्णन ।
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- Verses 1–2महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, उस रीति से अपनी शोभा की अधिकता में कारण बतला रही, अपने स्व…
- Verse 3'नाकिंचित् किंचिदा. ' इत्यादि वाक्य में असम्बद्धप्रलापत्व बतलाते हैं। भद्रे, बतलाओ तो सह…
- Verses 4–6'भोगैरभुक्तैस्तुष्यामि” यह तुम्हारा वचन भी असम्बद्ध ही है, ऐसा कहते हैं। जो पुरुष क्रोध स…
- Verse 7इदं वाहमिदं नाहम् इत्यादि वचन में भी असम्बद्धत्व बतलाते है । मैं देह नहीं हूँ, मैं कुछ ओ…
- Verses 8–15"पश्यामि यन्नयनरश्मिभिः“ यह जो तुमने अन्त में कहा है वह भी बिलकुल असंगत है, इसलिए तुम्हार…
- Verse 16खेचरसिद्धि में हेतुभूत क्रिया के प्रसंग से श्रीरामभद्र सामान्यक्रिया में निमित्त की जिज्ञ…
- Verses 17–18इस प्रकार आक्षेप कर प्रस्तुत विषय पूछते हैं। हे ब्रह्मन्, यह जो आकाशगमन आदि सिद्धियाँ है…
- Verse 19रामभद्र, जो आपने क्रिया की उत्पत्ति के विषय में आत्माश्रय, अनवस्था आदि दोषों का उद्वावन क…
- Verses 20–21उनमें फल की विलक्षणता दशति हैं। अपने अनुकूल उपादेय अर्थ का प्रयत्नपूर्वक निष्पादन किया जा…
- Verse 22ये तीनों साध्यभेद अज्ञानियों के लिए ही हैं, यह कहते हैं। सन्मति तत्त्वज्ञ विद्वान् की दृ…
- Verse 23ज्ञानी के लिए यदि तीसरा विकल्प मान भी लिया जाय, तो भी कोई दोष नहीं होता, इस आशय से कहते ह…
- Verse 24एक ही वस्तु एक पुरुष के बोध, राग ओर वैराग्य अवस्था के भेद से तीन प्रकार की हो जाती है, ऐस…
- Verse 25सिद्धि के तारतम्य मेँ तथा चिरकालिक एवं अचिरकालिक प्रयत्न की आवश्यकता मे उपाय बतलाते हैं ।…
- Verse 26ये जो देश आदि सिद्धि के चार साधन हैं उनमें श्रीशैल आदि उत्तमोत्तम देश आदि चार साधनों के म…
- Verse 27ठीक है, हमने वैसा मान लिया, इससे प्रकृत में क्या आया, इस पर कहते हैं। उड़ामरतन्त्र, योगिन…
- Verses 28–29यही न्याय मणि, मन्त्र आदि से होनेवाले सिद्धिक्रम के निरूपण मे तथा श्रीशैल आदि सिद्ध देश म…
- Verses 30–34तव तो मेरा प्रश्न बिलकुल निरर्थक ही है-इस विचार से श्रीरामचन्द्रजी को किसी तरह का दुःख न…
- Verse 35प्राणो के अपने अधीन हो जानेपर यानी प्राणो के ऊपर अपना सब नियन्त्रण हो जाने पर उनसे सम्बद्…
- Verse 36अब, देहस्थ वायु के अपने अधीन हो जाने से सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती है, यह जो कहा…
- Verse 37मूलाधार में स्वान्तर्गत कुण्डलिनी के स्थान की अनुकूलता से उसका वर्णन करते हैं । वीणादण्ड…
- Verses 38–40यह केवल मनुष्यों के ही शरीर में होती हो, यह बात नहीं है, किन्तु सभी जीवो के शरीरो में यह…
- Verses 41–42उसके मूल में साढ़े तीन वलय के आकार से युक्त कुण्डलिनी संज्ञावाली चित्शक्ति है । उसके आभ्…
- Verse 43उनमें प्राणशक्ति वेगप्रदान करनेवाली कैसे है, यह कहते है । वही अपने मुख से प्राणवायु को ऊप…
- Verse 44बुदिशक्ति को वेगप्रदान कनेवाली कैसे है, यह कहते है । जब हृदय में स्थित प्राणवायु कुण्डलिन…
- Verse 45कैसे इन्द्रियशक्ति को वेगप्रदान करती है, यह बतलाते है। इस तरह प्राण और बुद्धि को ज्ञान और…
- Verse 46कैसे वह इन्द्रियसन्निकर्षों की वशवर्तिनी है, यह कहते हैं। ज्यों-ज्यों चक्षु आदि इन्द्रियो…
- Verse 47मूलाधार में स्थित कुण्डलिनी की सब नाड़ियाँ चक्षु आदि इन्द्रियों के प्रवर्तन में द्वार हैं…
- Verse 48वे कैसे बारबार उसीसे उत्पन्न होती है तथा उसीमें विलीन हो जाती हैं, यह कहते हैं। प्राणरूप…
- Verse 49अपरिच्छिन्न चिति का-मूलाधार नाड़ीमूल में परिच्छिन्न कुण्डलिनी नामक अपने अंश से-उदय कैसे ओ…
- Verse 50जब देशकृत परिच्छेद का अभाव वस्तुकृत परिच्छेद के अभाव में अन्तभूत है तब तो कालकृत परिच्छेद…
- Verse 51संवित् में देशकृत परिच्छेद का अभाव होनेपर वह सर्वत्र भासित होने लगेगी, ऐसी आशंका करके के…
- Verse 52वह चितिवस्तु कहीं मिट्टी, पत्थर आदि वस्तुओं में अविद्यारूपी जडता से तिरोहित हो जाने के का…
- Verse 53जो अभिव्यक्तितारतम्य अभी कहा गया है, उसीका इस सर्ग की समाप्तितक क्रमशः निरूपण (%) देशकृत…
- Verse 54स्थूल और सूक्ष्म भूतो के अध्यास का विस्तारपूर्वक वर्णन करने के लिए उपोद्धात द्वारा सवके अ…
- Verses 55–58उस चिन्मात्र के उसी तरह से स्थित रहनेपर माया द्वारा कल्पित एक देश में आकाशादि सूक्ष्म भूत…
- Verse 59ठीक है, बात ऐसी ही है, किन्तु इससे प्रक्रत में आया क्या ? इसपर कहते हैं। हे रघुनन्दन्, इ…
- Verse 60किन्तु केवल चैतन्याभिव्यंजक प्राणादिपंचक (प्राण, मन, बुद्धि, कर्मेन्द्रिय ओर ज्ञानेन्द्रि…
- Verse 61तीनों में भी वह चिति किस तरह तारतम्य से स्थित है ? इसमें दरष्टान्त बतलाते हैं । जैसे दिन…
- Verse 62जैसे कहीं घनीभाव होने से चाचल्य के अभाव में भी सागर के सागरत्व में क्षति नहीं होती, वैसे…
- Verses 63–64भूततन्मात्रपंचक में स्वभाव के वश से इस तरह के अनेकों विकल्प देखे गये हैँ । हे पापशून्य श्…
- Verses 65–69अथवा वाणी के विषय में भी आपको आक्षेप न करना चाहिए, क्योकि वह वासनाकल्पित विकल्प की नाई पं…
- Verses 70–74वासना के स्वाप और प्रबोध के तारतम्य से पवको मे स्थावरादि की विचित्रता कैसे उत्पन्न होती ह…
- Verse 75यों अनन्त पंचकमेदों का वर्णन करके अव महाराज वक्तिष्ठजी-उनमे कर्मोपासनाओं के समूहो के अनुष…
- Verses 76–82सृष्टियों में जो आकाशवृक्षता कही गयी है, उसका-फल और गन्ध आदि की कल्पना द्वारा- उपपादन करत…