Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
यदिदं दृश्यते किंचिज्जगत्स्थावरजंगमम् ।
स्पन्दच्युतं क्रियानाम्नः कथमित्यनुभूयते ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
खेचरसिद्धि में हेतुभूत क्रिया के प्रसंग से श्रीरामभद्र सामान्यक्रिया में निमित्त की जिज्ञासा से
आक्षेप करते है।
श्रीरामजी ने कहा : गुरुवर, यह जो कुछ स्थावर ओर जंगम जगत् है वह सब क्रिया से ही उत्पादित
मालूम होता है (क्योकि कर्ता आदि कारकों की क्रिया के बिना किसी की उत्पत्ति देखी नहीं जाती हे,
ऐसी स्थिति में यह एक स्वाभाविक जिज्ञासा होती है कि) क्रियानामक स्पन्द की उत्पत्ति किससे हुई ?
उसकी उत्पत्ति सक्रिय से होगी, यह तो कह नहीं सकते, क्योकि इस समाधान में आत्माश्रय ओर
अनवस्था दोनों दोष स्थित हैं। यदि कूटस्थ से उसकी उत्पत्ति होती है, यह कहकर समाधान करें, तो
उसमें व्याघात, अविराम और फलनावस्था - ये तीन दोष आ जायेंगे। इसलिए हे महाराज, क्रियानामक
वस्तु की उत्पत्ति अनुभवपथ पर कैसे आती है ? उसे कहिये