Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verses 8–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verses 8–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 8-15
संस्कृत श्लोक
यत्पश्यामि न पश्यामि तत्पश्याम्यन्यदेव यत् ।
प्रलाप इत्यसंन्यस्य स कथं किल शोभते ॥ ८ ॥
तस्माद्बालासि मुग्धासि चपलासि विलासिनि ।
नानालापविलासेन क्रीडामि क्रीड सुन्दरि ॥ ९ ॥
प्रविहस्याट्टहासेन शिखिध्वज इति प्रियाम् ।
मध्याह्ने स्नातुमुत्थाय निर्जगामाङ्गनागृहात् ॥ १० ॥
कष्टं नात्मनि विश्रान्तो मद्वचांसि न बुद्धवान् ।
राजेति खिन्ना चूडाला स्वव्यापारपराभवत् ॥ ११ ॥
तदा तथाङ्ग तत्राथ तादृगाशययोस्तयोः ।
ताभिः पार्थिवलीलाभिः कालो बहुतिथो ययौ ॥ १२ ॥
एकदा नित्यतृप्ताया निरिच्छाया अपि स्वयम् ।
चूडालाया बभूवेच्छा लीलया खगमागमे ॥ १३ ॥
खगमागमसिद्ध्यर्थमथ सा नृपकन्यका ।
सर्वभोगाननादृत्य समागम्य च निर्जनम् ॥ १४ ॥
एकैवैकान्तनिरता स्वासनावस्थिताङ्गिका ।
ऊर्ध्वगप्राणपवनचिराभ्यासं चकार ह ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
"पश्यामि यन्नयनरश्मिभिः“ यह जो तुमने अन्त में कहा है वह भी बिलकुल असंगत है, इसलिए
तुम्हारे द्वारा उक्त ये अर्थ शोभा के हेतु नहीं हैं।
जो मैं इन्द्रियवृत्तियों से यह देखती हूँ उसे पारमार्थिकरूप से नहीं देखती हूँ। जिसे मैं पारमार्थिकरूप
से देखती हूँ वह कोई और ही चीज है। इस प्रकार का जो प्रलाप है, उसे त्यागे बिना वह कौन है, जो
शोभित हो सकता है ? इसलिए हे सुन्दरी, तुम बाला हो, मुग्धा हो ओर चपल हो । हे विलासिनि, अनेक
प्रकार के आलापविलासों से जिस तरह मेँ क्रीडा करता हूँ, उसी तरह तुम भी क्रीडा करो । राजा
शिखिध्वज ने उस प्रकार अपनी प्रिया चूडाला के प्रति अडहास-से हँसकर मध्याह मेँ स्नान करने के
लिए उठकर चूडाला के घर से प्रस्थान किया । बड़ दुःख का विषय है कि अभी तक राजा अपने स्वरूप
में स्थित नहीं हुआ है । मेरे वचनं को भी वह न न समझ सका-इस प्रकार विचार से छिन्न हुई वह चूडाला
अपने कार्य में संलग्न हो गयी । हे रामभद्र, तदनन्तर वहीं पर उस प्रकार के भिन्न-भिन्न आशय से
युक्त उन दोनों का उस समय भी पहले की पार्थिवलीलाओं से उसी तरह बहुत काल चला गया | एक
समय की बात है कि नित्यतृप्त ओर निरीह भी चूडाला को लीलावश आकाश में देवताओं के सदृश
गमनागमन करने की स्वयं इच्छा हुई तदनन्तर वह राजकन्या आकाश में यथेष्ट संचार की सिद्धि के
लिए सर्वविध विषयों का अनादर कर ओर निर्जन स्थान में आकर स्वयं अकेली ही एकान्त में निरत तथा
अपने आसन के ऊपर उचित अंगों से अवस्थित हो ऊर्ध्वगामी प्राणपवन का दीर्घ आकाशसंचार की
सिद्धि के लिए अनुकूल भूमध्य आदि देश में निरोध करने के लिए अभ्यास करने लगी