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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verses 17–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verses 17–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 17,18

संस्कृत श्लोक

कस्य स्पन्दविलासस्य घनाभ्यासस्य मे वद । ब्रह्मन्खगमनाद्येतत्फलं यत्नैकशालिनः ॥ १७ ॥ आत्मज्ञो वाप्यनात्मज्ञः सिद्ध्यर्थे लीलयाथवा । कथं संसाधयत्येतद्यथा तद्वद मे प्रभो ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आक्षेप कर प्रस्तुत विषय पूछते हैं। हे ब्रह्मन्‌, यह जो आकाशगमन आदि सिद्धियाँ हैं वे घनाभ्यस्त किस प्रयत्नशाली स्पन्दविलास के फल हैं, यह मुझसे किये । हे प्रभो, जो अनात्मज्ञ पुरुष हैं वे अपनी सिद्धि के लिए अथवा जो आत्मज्ञ हैं वे एकमात्र लीला के लिए किस क्रम से इन सिद्धियों को सिद्ध करते हैं, वह जैसा है, मुझसे किये