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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 53

संस्कृत श्लोक

एतद्भूयः क्रमेणाहं शृणु वक्ष्यामि तेऽनघ । देहे स्वे च यथोदेति भृशं संविन्मयक्रमः ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

जो अभिव्यक्तितारतम्य अभी कहा गया है, उसीका इस सर्ग की समाप्तितक क्रमशः निरूपण (%) देशकृत परिच्छेद के अभाव का भी वस्तुकृत परिच्छेद के अभाव में ही अन्तर्भाव है, इस आशय से यहाँ काल और वस्तुकृतपरिच्छेद के अभाव का उपादान किया गया है । करने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं। हे पापशून्य श्रीरामजी, पशुओं से लेकर स्थावर आदि देहों में तथा मनुष्यादि शरीरो मेँ जिस तारतम्य से संविन्मयक्रम उदित होता है, यह फिर मैं आपसे क्रमश: कहता हूँ, आप खूब सुनिये