Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verses 20–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verses 20–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 20,21
संस्कृत श्लोक
आत्मभूतं प्रयत्नेन उपादेयं च साध्यते ।
हेयं संत्यज्यते ज्ञात्वा उपेक्ष्यं मध्यमेतयोः ॥ २० ॥
यद्यदाह्लादनकरमादेयं तच्च सन्मते ।
तद्विरुद्धमनादेयमुपेक्ष्यं मध्यमं विदुः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
उनमें फल की विलक्षणता दशति हैं।
अपने अनुकूल उपादेय अर्थ का प्रयत्नपूर्वक निष्पादन किया जाता है। अपने प्रतिकूल जानकर
हेय वस्तु का त्याग किया जाता है। हेय और उपादेय दोनों के बीच का अर्थ उपेक्ष्य होता है। हे सदृबुद्धे,
जो वस्तु साक्षात् या परम्परा से सुख के अनुकूल होती है वह उपादेय होती है और जो वस्तु सुखविघातक
होती है वह हेय होती है एवं जो वस्तु इन दोनों के बीच की होती है वह उपेक्ष्य होती है, ऐसा अनुभवी
लोगों का कहना है