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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 60

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verse 60 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 60

संस्कृत श्लोक

केवलं पञ्चकवशाद्देहादौ चेतनाभिधा । जडस्पन्दाभिधा क्वापि स्थावरादौ जडाभिधा ॥ ६० ॥

हिन्दी अर्थ

किन्तु केवल चैतन्याभिव्यंजक प्राणादिपंचक (प्राण, मन, बुद्धि, कर्मेन्द्रिय ओर ज्ञानेन्द्रिय) के कारण लिंगशरीर की प्रधानता से मनुष्यादि देहों में मुख्यचेतन नामवाली, कहीं (तिर्यगादि में) लिंग और स्थूल देह की प्रधानता में समता होने से जडचेतननामवाली ओर स्थावरादि में तो लिंगशरीर के अन्तःसंवेदनमात्र होने से बाहर मनुष्यों द्वारा चैतन्य की भावना न होने से वह चितिसंवित्‌ केवल जडनामवाली प्रसिद्ध है