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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verses 76–82

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verses 76–82 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 76-82

संस्कृत श्लोक

इन्द्रियाणि च पुष्पादि विषयामोदवर्ति हि । इच्छाभ्रमर्यो राजन्त्यो मञ्जर्यश्चञ्चलक्रियाः ॥ ७६ ॥ लोकान्तराणि स्वच्छानि गुल्मा मूलं समेरवः । पल्लवा नीलजलदा लता लोला दिशो दश ॥ ७७ ॥ वर्तमानानि भूतानि भविष्यन्ति च यानि तत् । जयन्ति तान्यसंख्यानि फलानि रघुनन्दन ॥ ७८ ॥ पञ्चबीजास्त एते हि राम पञ्चकपादपाः । स्वयं स्वभावाज्जायन्ते स्वयं नश्यन्ति कालतः ॥ ७९ ॥ स्वयं नानात्वमायान्ति चिरं जाड्यात्स्फुरन्ति च । स्वविविक्ताः शमं यान्ति तरङ्गा इव वारिधौ ॥ ८० ॥ इतो यान्ति समुत्सेधमितो यान्ति शमं स्वयम् । एते जाड्यविवेकाभ्यां तरङ्गा इव तोयधौ ॥ ८१ ॥ ये विवेकवशमालयं गता राम पञ्चकविलासराशयः । तेन भूय इह यान्ति संस्थितिं प्रभ्रमन्ति जगतीतरे मुहुः ॥ ८२ ॥

हिन्दी अर्थ

सृष्टियों में जो आकाशवृक्षता कही गयी है, उसका-फल और गन्ध आदि की कल्पना द्वारा- उपपादन करते हैं। उनमें इन्द्रियाँ विषयरूपी सुगन्धप्रधान पुष्प आदि हैं, इच्छा भौरियाँ हैं और चंचल कर्मेन्द्रियों की क्रियाँ मंजरियों के रूप में शोभित होती हैं। स्वच्छ स्वर्गादि लोकान्तर वृक्ष हे, सुमेरुसहित सभी पर्वत मूल हैँ । काले बादल पल्लव हैँ ओर दसो दिशाएँ चंचल लताएँ हैं। हे रघुनन्दन, वर्तमान ओर भविष्यत्‌ चार प्रकार के जो शरीर हैं वे सब उस वृक्ष के अनन्त फल के रूप में विराजमान हैं। हे श्रीरामजी, इस तरह ये पंचबीज तथा पंचवृक्ष अपने विवेकशून्य आत्मा से स्वयं उत्पन्न होते हैं और समय पाकर स्वयं नष्ट भी हो जाते हैं। ये स्वयं नानाभावको प्राप्त होते हैं, जड़ता के कारण चिरकालतक स्फुरित होते रहते हैं और समुद्र में तरंग की नाई अपने से विवेकदृष्टि से दिखने पर शान्त हो जाते है । हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे समुद्र में एक ओर तरंग उत्पन्न होते हैं और दूसरी ओर स्वयं नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही ये सब जडता के कारण एक ओर उन्नति को प्राप्त होते हैं और दूसरी ओर विवेक के कारण स्वयं नष्ट हो जाते हैं। हे श्रीरामजी, जो पंचकविलास की राशियाँ निर्वासन नाशपर्यन्त विवेक के वश में चली गयी हैं वे इस संसार में पुनः जन्म-मरण देहधारणादिरूप संस्थिति को प्राप्त नहीं होती और दूसरी पंचकविलास की राशियाँ तो निरन्तर इस संसार में भ्रमण किया करती हैं