Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 61

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verse 61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 61

संस्कृत श्लोक

यथा स्तब्धः स्थितो वीचिरिव स्थलमिवास्थितः । पञ्चकेषु तथैतच्चिल्लोलरूपा जडान्विता ॥ ६१ ॥

हिन्दी अर्थ

तीनों में भी वह चिति किस तरह तारतम्य से स्थित है ? इसमें दरष्टान्त बतलाते हैं । जैसे दिन में पिघला हुआ घी का समुद्र सायंकाल में शीतल पवन के स्पर्श से तट पर धीरे-धीरे गाढ़ हो जाने से निश्चल होकर द्रवस्थान में तरंग के समान चंचल, कुछ घनीभूत प्रदेश में कुछ चंचल और अत्यन्त घनीभूत प्रदेश में स्थल की नाईं अचल स्थिर रहता है, वैसे ही यह चितिसंवित्‌ नर, तिर्यक्‌ और स्थावरादि देहरूप पंचकों में क्रम से चंचल, कुछ चंचल तथा अत्यन्त जडता से युक्त अर्थात्‌ बिलकुल निश्चल स्थित रहती हे