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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

मध्ये चतुर्णामेवैषां क्रियाप्राधान्यकल्पना । सिद्ध्यादिसाधने साधो तन्मयास्ते यतः क्रमाः ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

ये जो देश आदि सिद्धि के चार साधन हैं उनमें श्रीशैल आदि उत्तमोत्तम देश आदि चार साधनों के मिल जानेपर शीघ्र स़रिद्धियों का लाभ हो जाने से योग, मन्त्र, जप आदि क्रियाओं में दूसरे देश में अनुष्ठित क्रियाओं की अपेक्षा प्रधान उत्कर्ष की कल्पना होती है ओर तद्नुसार ही फलोत्कर्ष भी होता है, यह कहते हैं। हे साधो, सिद्धि आदि के साधन में ये जो चार हेतु हैं उनमें श्रीशैल आदि में अनुष्ठित योग आदि क्रिया में उत्कर्ष की कल्पना होती है, क्योकि फलोत्कर्षक्रम जितने हैं वे सभी उन क्रियाओं के उत्कर्ष के अनुसार ही होती हैं