Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verses 30–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verses 30–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 30-34
संस्कृत श्लोक
तस्माच्छिखिध्वजकथाप्रसङ्गपतितामिमाम् ।
प्राणादिपवनाभ्यासक्रियां सिद्धिफलां श्रृणु ॥ ३० ॥
अन्तस्था ह्यखिलास्त्यक्त्वा साध्यार्थेतरवासनाः ।
गुदादिद्वारसंकोचान्स्थानकादिक्रियाक्रमैः ॥ ३१ ॥
भोजनासनशुद्ध्या च साधुशास्त्रार्थभावनात् ।
स्वाचारात्सुजनासङ्गात्सर्वत्यागात्सुखासनात् ॥ ३२ ॥
प्राणायामघनाभ्यासाद्राम कालेन केनचित् ।
कोपलोभादिसंत्यागाद्भोगत्यागाच्च सुव्रत ॥ ३३ ॥
त्यागादाननिरोधेषु भृशं यान्ति विधेयताम् ।
प्राणाः प्रभुत्वात्तज्ज्ञस्य पुंसो भृत्या इवाखिलाः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
तव तो मेरा प्रश्न बिलकुल निरर्थक ही है-इस विचार से श्रीरामचन्द्रजी को किसी तरह का दुःख न
हो, इसलिए प्रस्तुत ज्ञान की दढता में उपयोगी, आनुषंगिक आकाशगमनादि सिद्धियो मे साधनभूत
तथा वर्णन की जा रही कथा से सम्बद्ध प्राणायामक्रम संक्षेप से सुनाते हैं।
इसलिए हे श्रीरामजी, शिखिध्वज की कथा के प्रसंग से प्राप्त सिद्धिरूपी फल से युक्त इस प्राणादि
वायु की अभ्यासक्रिया का आप श्रवण कीजिये । साध्यार्थ ओर साधनार्थ अखिल अन्तस्थ वासनाओं
का त्यागकर गुदा आदि द्वारों के संकोच से, सिद्धादि आसन, काय, मस्तक और गर्दन की समता,
निश्चलता, तथा नासिका के अग्रभाग में अवलोकनादि योगशारत्रोक्त क्रियाक्रमों से; भोजन और
आसन की शुद्धि से, भलीभाँति योगशारत्र के परिशीलन से, उत्तम आचार से, सज्जनं के संग से,
सर्वत्याग से, सुखासन से, कुछ काल तक प्राणायाम के दृढ़ अभ्यास से, क्रोध, लोभ आदि के बिलकुल
त्याग से तथा भोगों के त्याग से हे सुव्रत श्रीरामचन्द्रजी, रेचक, पूरक ओर कुम्भक का अच्छी तरह
अभ्यास हो जाने पर प्राणों का स्वामी हो जाने के कारण योगियों के सब प्राण उस तरह उनके अधीन हो
जाते हैं, जिस तरह राजा के नौकर