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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 62

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verse 62 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 62

संस्कृत श्लोक

इतः सौम्य इतो लोलः किमब्धिरिति नो यथा । विकल्पादौ तथैवैतत्पञ्चकं हि जडाजडम् ॥ ६२ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे कहीं घनीभाव होने से चाचल्य के अभाव में भी सागर के सागरत्व में क्षति नहीं होती, वैसे ही स्थावरादिभाव में भी चिति की चिद्रूपता में कुछ भी क्षति नहीं होती, यह कहते हैं। सागर कहीं से शान्त और कहीं से चंचल रहे, तो क्या वह सागर नहीं कहा जाता ? अर्थात्‌ वह जैसे सागर ही कहा जाता है, वैसे ही सुर, नर, पशु, पक्षी आदि योनियों में चंचलता का न्यूनाधिकभाव होनेपर भी चैतन्य सब जगह अक्षत है, क्योंकि यह सम्पूर्ण भूततन्मात्रपंचक जड ओर अजड है। तात्पर्य यह है कि यह जडअजडविकल्प, चिति में अध्यस्त भूततन्मात्रपंचक का धर्म है, चितिका धर्म नहीं है; क्योकि वह चिति तो निर्धर्मक है