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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एवमात्मनि विश्रान्तां वदन्तीं तां वराननाम् । अबुद्ध्वा तद्गिरामर्थं विहस्योवाच भूपतिः ॥ १ ॥ शिखिध्वज उवाच । असंबद्धप्रलापासि बालासि वरवर्णिनि । रमसे राजलीलाभी रमस्वावनिपात्मजे ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, उस रीति से अपनी शोभा की अधिकता में कारण बतला रही, अपने स्वरूपभूत आत्मा में विश्रान्त कान्तवदन उस चूडाला के प्रति हँसकर उसके वचनों का भाव न जानकर राजा शिखिध्वज बोला | हे सुरूपे, राजपुत्रि ! तुम प्रौढ़ नहीं हुई हो दूसरे को समझाने में उपयोग वाक्य बोलने में अपटु हो, इसीलिए असम्बद्ध प्रलाप करती हो । तुम जिन राजलीलाओं से रमण करती हो उन्हीं से रमण किया करो

सर्ग सन्दर्भ

उननासीवाँ सर्ग समाप्त अस्सीवाँ सर्ग अज्ञ राजा द्वारा चूडाला के वचन में असम्बद्धत्व और खेचरत्व आदि सिद्धियों के बीज का वर्णन ।