Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verses 28–29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verses 28–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 28,29
संस्कृत श्लोक
रत्नौषधितपोमन्त्रक्रियाक्रमनिरूपणम् ।
आस्तामेव किलैषोऽपि विस्तारः प्रकृतार्थहा ॥ २८ ॥
श्रीशैले सिद्धदेशे च मेर्वादौ वा निवासतः ।
सिद्धिरित्यपि विस्तारः कृतार्थ प्रकृतार्थहा ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
यही न्याय मणि, मन्त्र आदि से होनेवाले सिद्धिक्रम के निरूपण मे तथा श्रीशैल आदि सिद्ध देश में
निवास से सिद्ध होनेवाले सरिद्धिक्रम के निरुपण में भी लगाना चाहिए, यह कहते हैं।
हे रामभद्र, मणि, औषधि, तप, मन्त्र और क्रिया से होनेवाली सिद्धि के क्रम का निरूपण भी दूर ही
रहे, क्योंकि उसका विस्तारपूर्वक निरूपण करना भी प्रकृत आत्मतत्त्वरूप अर्थ का विघातक ही है। हे
कृतार्थ श्रीरामजी, सिद्ध देश से प्रसिद्ध श्रीशेल अथवा मेरू पर्वत पर निवास कर रहे पुरुष को सिद्धि
होती है-इसका भी विस्तारपूर्वक वर्णन करना आपके जैसे सिद्धियों में तुच्छत्व बुद्धि रखनेवाले पुरुषों
के लिए प्रकृत आत्मचिन्तनरूप अर्थ का विघातक ही सिद्ध होगा