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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verses 63–64

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verses 63–64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 63,64

संस्कृत श्लोक

देहादिपञ्चकं जीवः स्पन्दः शैलादिकं जडम् । स्थावराद्यनिलस्पन्दि स्वभाववशतोऽनघ ॥ ६३ ॥ वाचः पर्यनुयोक्तव्याः स्वभावाद्रघुनन्दन । शीतोष्णादि हिमाग्न्यादि वाक्चेति परिदृश्यते ॥ ६४ ॥

हिन्दी अर्थ

भूततन्मात्रपंचक में स्वभाव के वश से इस तरह के अनेकों विकल्प देखे गये हैँ । हे पापशून्य श्रीरामजी, देहादि आकार मेँ परिणत पंचक-प्राणधारण के अधीन स्पन्दन ओर चैतन्य के कारण-जीव (चेतन) कहलाता है, उससे स्पन्द होता है ओर शैल आदि तो केवल जड ही हे । स्थावरादि शरीर तो बाहर की वायु से स्पन्दनशील (चेष्टावान्‌) होते हैं तथा अन्तःकरण ही चेतन हे, इत्यादि स्वभाव के ही वश से होते हैं । हे रघुनन्दन, यदि आप यह आक्षेप करे कि जो स्वभाव यानी स्वात्मक भाव है वह विरुद्धविकल्पात्मक कैसे हो सकता है, क्योकि विरोध परसापेक्ष ओर स्वभाव अनन्यपेक्ष होता है । यदि आप यह कहें कि स्वीय यानी अपना जो भाव वह स्वभाव है, तो भी वह स्वमात्रसापेक्ष ही हुआ, परसापेक्ष नहीं; इसलिए वह परसापक्ष विकल्प का स्वरूप या निमित्त कैसे हो सकेगा ? तो मैं आपसे यह पूछता हू किं स्वभाव को छोडकर (स्वभाव के विषय में किसी तरह का आक्षेप न कर) पहले आपको वाणियों के विषय में ही आक्षेप करना चाहिए, क्योंकि वे चित्‌- जडादिशब्दस्वरूप ही हैँ । अपने पुनरूक्तिदोष की निवृत्ति के लिए वे स्वार्थ की व्यावृत्ति करती हुई चैतन्य और जाङ्य को विरुद्ध बनाती हैं एवं शीतोष्णादि धर्मपरक ओर हिमअग्नि आदि धर्मिपरक सम्पूर्णं वाणिर्यो भी, जो इसी तरह की हैं, सर्वत्र दिखाई पडती हे