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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verses 4–6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verses 4–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 4-6

संस्कृत श्लोक

भोगैरभुक्तैस्तुष्टोऽहमिति भोगान्जहाति यः । रुषेवासनशय्यादीन्स कथं किल शोभते ॥ ४ ॥ भोगाभोगे परित्यज्य खे शून्ये रमते तु यः । एक एवाखिलं त्यक्त्वा स कथं किल शोभते ॥ ५ ॥ वसनाशनशय्यादीन्सर्वान्संत्यज्य धीरधीः । यस्तिष्ठत्यात्मनैवैकः स कथं किल शोभते ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

'भोगैरभुक्तैस्तुष्यामि” यह तुम्हारा वचन भी असम्बद्ध ही है, ऐसा कहते हैं। जो पुरुष क्रोध से आसन, शय्या आदि के परित्याग की नाई भोगों का "अभुक्त भोगों से ही मेँ तुष्ट हू इस बुद्धि से परित्याग करता है, वह कैसे शोभित हो सकता है ? एकैवाकाशसंकारो केवले हृदये रमे" यह जो तुमने कहा है वह भी असंगत है । साक्षात्‌ भोजन और मित्र, सेवक आदि का भोजन-इनका परित्याग कर तथा भोजनसाधन धनादि समस्त वस्तुओं का परित्याग कर जो एक शून्य आकाश में ही पिशाचवत्‌ रमण करता है, वह शोभित होता है; यह कहना कैसे संगत हो सकता है ? क्रोध की नाई धेर्यमात्र का अवलम्बन कर शीत, उष्ण, क्षुधा, तृष्णा आदि का सहन करनेवाला पुरुष वसन, अशन, शय्या आदि सर्वविध साधनों का परित्याग कर जो अकेला स्वरूप से ही स्थित रहता हे, वह कैसे शोभित हो सकता है ?