Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
नित्यं पातोत्सुकतया प्रवेशोन्मुखया तया ।
सा सर्वसंविदां बीजं ह्येका सामान्युदाहृता ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
वे कैसे बारबार उसीसे उत्पन्न होती है तथा उसीमें विलीन हो जाती हैं, यह कहते हैं।
प्राणरूप से उसके ऊर्ध्वगमन में उत्सुक होने तथा अपानरूप से अधःप्रवेश की ओर उन्मुख होने
से सम्पूर्ण ज्ञानों की एक वही साधारण बीज कही गयी है