Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, verse 49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
आकल्पादनवच्छिन्ना चित्संवित्सर्वमस्ति हि ।
तस्मात्कुण्डलिनीकोशात्केनार्थेनोदयः स्फुटः ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
अपरिच्छिन्न चिति का-मूलाधार नाड़ीमूल में परिच्छिन्न कुण्डलिनी नामक अपने अंश से-उदय
कैसे ओर किस लिए होता है, यह श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं।
महर्षे, जब वस्तु और काल से (%) अपरिच्छिन्न सर्वात्मक चितिसंवित् है, तब उस कुण्डलिनीकोश
से ही सब तरह की संवित् का स्फुट उदय होता है, यह कैसे और किसलिए ?